बुधवार, 29 जून 2011

अंतर्द्वंद

रात भर मैं नींद का आँचल पकडकर सोचता था |
निशा की गोद में बैठा ख्वाब सा कोई देखता था ||

                         आज तो जीवन में प्रथम ही बार ऐसा वक्त आया |
                         नींद से भी जुदा होने का एक नया अंदाज  पाया ||

पड़ रहे प्रहरों के घन पर शिथिलता नहिं जरा सी ||
मधुर स्मृतियों से घिरा देखकर मुझको  लजाती ||
                                         
                          गमों को भूलने की एक कोशिश ही समझकर के ||
                          मनाने मैं चला उत्सव कहीं  मधुमास जब महके ||

प्रतीक्षा रात भर जिसकी किया था बेसुमारी से |
किनारे टूट कर गिरते हैं नयन के खारे पानी से ||

                            सजाकर सेज पलकों की रातभर राह जब देखा |
                            मिली उन बिदुओं के बीच स्मृति की कोई रेखा ||

समझने की किया कोशिश तो मैं और भी उलझा |
नींद और कल्पनाओं का पूर्व सम्बन्ध न सुलझा |

                               शाम से सुबह की यात्रा से बोझिल नेत्र अब हारे |
                               छिप गये हैं गगन में ज्यों मेरे सौभाग्य के तारे ||

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