रविवार, 11 सितंबर 2011

चिर अवशेष

 परम सौभाग्य से मिलता,
  पुरा संस्कृति का परिवेश |
   मूकसम्प्रेषण की ध्वनि से ,
    स्वयं ही देते कोई सन्देश ||

                    देव संस्कृति संजोये ऐसे जो ,
                     खण्डहरों  के  चिर अवशेष |
                      आज भी मुखरित हो उठते,
                       सुनाकर गौरवमय सन्देश ||

निरख खण्डहरों के अवशेष,
कोई प्रतिध्वनि गूंजी अज्ञात |
  तपस्वी ऋषियों की वह भूमि,
     दिखा बैठी अपना  इतिहास ||

            कोटि वृक्षों से वह घिरा  हुआ, 
             बीच में अविरल सरित प्रवाह |
             विविध पशु पक्षी से मुखरित,
                छोड़ता अपना अमिट प्रभाव ||

देखते  रहते  उनको अनिमेष,
जिज्ञाषा लेती किंचित विश्राम |
 मन्दिरों से अभिमंडित भू-भाग,
  कोटिशः  तुझको  मेरा  प्रणाम ||

1 टिप्पणी:

  1. परम सौभाग्य से मिलता,
    पुरा संस्कृति का परिवेश |

    ...sach hai!! :)

    Saadar..

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